महाभारत 4.23.2
यथा वज्रेण वै दीर्णं पर्वतस्य महच्छिरःविनिकीर्णं प्रदृश्येत तथा सूता महीतले
yathā vajreṇa vai dīrṇaṃ parvatasya mahacchiraḥvinikīrṇaṃ pradṛśyeta tathā sūtā mahītale
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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