महाभारत 4.24.14
वर्त्मान्यन्विष्यमाणास्तु रथानां रथसत्तमकंचित्कालं मनुष्येन्द्र सूतानामनुगा वयम्
vartmānyanviṣyamāṇāstu rathānāṃ rathasattamakaṃcitkālaṃ manuṣyendra sūtānāmanugā vayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें