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महाभारत 4.25.11
विविधैस्तत्परैः सम्यक्तज्ज्ञैर्निपुणसंवृतैःअन्वेष्टव्याश्च निपुणं पाण्डवाश्छन्नवासिनः
vividhaistatparaiḥ samyaktajjñairnipuṇasaṃvṛtaiḥanveṣṭavyāśca nipuṇaṃ pāṇḍavāśchannavāsinaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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