महाभारत 4.27.13
नासूयको न चापीर्षुर्नातिवादी न मत्सरीभविष्यति जनस्तत्र स्वं स्वं धर्ममनुव्रतः
nāsūyako na cāpīrṣurnātivādī na matsarībhaviṣyati janastatra svaṃ svaṃ dharmamanuvrataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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