महाभारत 4.29.24
जघन्यतो वयं तत्र यास्यामो दिवसान्तरम्विषयं मत्स्यराजस्य सुसमृद्धं सुसंहताः
jaghanyato vayaṃ tatra yāsyāmo divasāntaramviṣayaṃ matsyarājasya susamṛddhaṃ susaṃhatāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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