महाभारत 4.29.26
गवां शतसहस्राणि श्रीमन्ति गुणवन्ति चवयमपि निगृह्णीमो द्विधा कृत्वा वरूथिनीम्
gavāṃ śatasahasrāṇi śrīmanti guṇavanti cavayamapi nigṛhṇīmo dvidhā kṛtvā varūthinīm
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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