महाभारत 4.29.2
असकृन्निकृतः पूर्वं मत्स्यैः साल्वेयकैः सहसूतेन चैव मत्स्यस्य कीचकेन पुनः पुनः
asakṛnnikṛtaḥ pūrvaṃ matsyaiḥ sālveyakaiḥ sahasūtena caiva matsyasya kīcakena punaḥ punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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