महाभारत 4.30.4
ततो जवेन महता गोपाः पुरमथाव्रजत्अपश्यन्मत्स्यराजं च रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली
tato javena mahatā gopāḥ puramathāvrajatapaśyanmatsyarājaṃ ca rathātpraskandya kuṇḍalī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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