महाभारत 4.31.7
रुक्मपृष्ठानि चापानि व्यतिषक्तानि धन्विनाम्पततां लोकवीराणां सव्यदक्षिणमस्यताम्
rukmapṛṣṭhāni cāpāni vyatiṣaktāni dhanvināmpatatāṃ lokavīrāṇāṃ savyadakṣiṇamasyatām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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