महाभारत 4.38.57
यस्तु पाञ्चनखे कोशे निहितश्चित्रसेवनेनकुलस्यैष निस्त्रिंशो गुरुभारसहो दृढः
yastu pāñcanakhe kośe nihitaścitrasevanenakulasyaiṣa nistriṃśo gurubhārasaho dṛḍhaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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