महाभारत 4.4.10
नास्य यानं न पर्यङ्कं न पीठं न गजं रथम्आरोहेत्संमतोऽस्मीति स राजवसतिं वसेत्
nāsya yānaṃ na paryaṅkaṃ na pīṭhaṃ na gajaṃ rathamārohetsaṃmato'smīti sa rājavasatiṃ vaset
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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