महाभारत 4.4.43
यानं वस्त्रमलंकारं यच्चान्यत्संप्रयच्छतितदेव धारयेन्नित्यमेवं प्रियतरो भवेत्
yānaṃ vastramalaṃkāraṃ yaccānyatsaṃprayacchatitadeva dhārayennityamevaṃ priyataro bhavet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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