महाभारत 4.44.15
आत्मानं यः समुद्बध्य कण्ठे बद्ध्वा महाशिलाम्समुद्रं प्रतरेद्दोर्भ्यां तत्र किं नाम पौरुषम्
ātmānaṃ yaḥ samudbadhya kaṇṭhe baddhvā mahāśilāmsamudraṃ pratareddorbhyāṃ tatra kiṃ nāma pauruṣam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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