महाभारत 4.44.5
परिचिन्त्य तु पार्थेन संनिपातो न नः क्षमःएकः कुरूनभ्यरक्षदेकश्चाग्निमतर्पयत्
paricintya tu pārthena saṃnipāto na naḥ kṣamaḥekaḥ kurūnabhyarakṣadekaścāgnimatarpayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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