महाभारत 4.45.17
यं यमेषोऽभिसंक्रुद्धः संग्रामेऽभिपतिष्यतिवृक्षं गरुडवेगेन विनिहत्य तमेष्यति
yaṃ yameṣo'bhisaṃkruddhaḥ saṃgrāme'bhipatiṣyativṛkṣaṃ garuḍavegena vinihatya tameṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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