महाभारत 4.5.20
निशम्य यस्य विस्फारं व्यद्रवन्त रणे परेपर्वतस्येव दीर्णस्य विस्फोटमशनेरिव
niśamya yasya visphāraṃ vyadravanta raṇe pareparvatasyeva dīrṇasya visphoṭamaśaneriva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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