महाभारत 4.5.9
स राजधानीं संप्राप्य कौन्तेयोऽर्जुनमब्रवीत्क्वायुधानि समासज्य प्रवेक्ष्यामः पुरं वयम्
sa rājadhānīṃ saṃprāpya kaunteyo'rjunamabravītkvāyudhāni samāsajya pravekṣyāmaḥ puraṃ vayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें