महाभारत 4.53.56
प्रमाथिनं महावीर्यं दृढमुष्टिं दुरासदम्जेतारं देवदैत्यानां सर्पाणां च महारथम्
pramāthinaṃ mahāvīryaṃ dṛḍhamuṣṭiṃ durāsadamjetāraṃ devadaityānāṃ sarpāṇāṃ ca mahāratham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें