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महाभारत 4.53.5
ससंहाराणि दिव्यानि सर्वाण्यस्त्राणि मारिषधनुर्वेदश्च कार्त्स्न्येन यस्मिन्नित्यं प्रतिष्ठितः
sasaṃhārāṇi divyāni sarvāṇyastrāṇi māriṣadhanurvedaśca kārtsnyena yasminnityaṃ pratiṣṭhitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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