महाभारत 4.59.12
अग्निचक्रमिवाविद्धं सव्यदक्षिणमस्यतःगाण्डीवमभवद्राजन्पार्थस्य सृजतः शरान्
agnicakramivāviddhaṃ savyadakṣiṇamasyataḥgāṇḍīvamabhavadrājanpārthasya sṛjataḥ śarān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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