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महाभारत 4.62.4
क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतसःऊचुः प्रणम्य संभ्रान्ताः पार्थ किं करवाम ते
kṣutpipāsāpariśrāntā videśasthā vicetasaḥūcuḥ praṇamya saṃbhrāntāḥ pārtha kiṃ karavāma te
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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