महाभारत 4.64.10
शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नडाअभिवाद्य विराटं च कङ्कं चाप्युपतिष्ठत
śoṇite tu vyatikrānte praviveśa bṛhannaḍāabhivādya virāṭaṃ ca kaṅkaṃ cāpyupatiṣṭhata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें