महाभारत 4.64.3
ततः पप्रच्छ पितरं त्वरमाण इवोत्तरःकेनायं ताडितो राजन्केन पापमिदं कृतम्
tataḥ papraccha pitaraṃ tvaramāṇa ivottaraḥkenāyaṃ tāḍito rājankena pāpamidaṃ kṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें