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महाभारत 4.66.2
नकुलः सहदेवो वा द्रौपदी वा यशस्विनीयदा द्यूते जिताः पार्था न प्राज्ञायन्त ते क्वचित्
nakulaḥ sahadevo vā draupadī vā yaśasvinīyadā dyūte jitāḥ pārthā na prājñāyanta te kvacit
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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