महाभारत 5.102.16
ध्रुवं तथा तद्भविता जानीमस्तस्य निश्चयम्तेन हर्षः प्रनष्टो मे सुपर्णवचनेन वै
dhruvaṃ tathā tadbhavitā jānīmastasya niścayamtena harṣaḥ pranaṣṭo me suparṇavacanena vai
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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