महाभारत 5.102.17
मातलिस्त्वब्रवीदेनं बुद्धिरत्र कृता मयाजामातृभावेन वृतः सुमुखस्तव पुत्रजः
mātalistvabravīdenaṃ buddhiratra kṛtā mayājāmātṛbhāvena vṛtaḥ sumukhastava putrajaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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