महाभारत 5.102.25
पुरंदरोऽथ संचिन्त्य वैनतेयपराक्रमम्विष्णुमेवाब्रवीदेनं भवानेव ददात्विति
puraṃdaro'tha saṃcintya vainateyaparākramamviṣṇumevābravīdenaṃ bhavāneva dadātviti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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