महाभारत 5.102.27
कण्व उवाच · kaṇva uvāca
प्रादाच्छक्रस्ततस्तस्मै पन्नगायायुरुत्तमम्न त्वेनममृतप्राशं चकार बलवृत्रहा
prādācchakrastatastasmai pannagāyāyuruttamamna tvenamamṛtaprāśaṃ cakāra balavṛtrahā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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