महाभारत 5.103.2
पक्षवातेन महता रुद्ध्वा त्रिभुवनं खगःसुपर्णः परमक्रुद्धो वासवं समुपाद्रवत्
pakṣavātena mahatā ruddhvā tribhuvanaṃ khagaḥsuparṇaḥ paramakruddho vāsavaṃ samupādravat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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