महाभारत 5.103.38
यथैवेश्वरसृष्टोऽस्मि यद्भावि या च मे गतिःतथा महर्षे वर्तामि किं प्रलापः करिष्यति
yathaiveśvarasṛṣṭo'smi yadbhāvi yā ca me gatiḥtathā maharṣe vartāmi kiṃ pralāpaḥ kariṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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