महाभारत 5.103.5
वृतश्चैष महानागः स्थापितः समयश्च मेअनेन च मया देव भर्तव्यः प्रसवो महान्
vṛtaścaiṣa mahānāgaḥ sthāpitaḥ samayaśca meanena ca mayā deva bhartavyaḥ prasavo mahān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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