महाभारत 5.110.1
गालव उवाच · gālava uvāca
गरुत्मन्भुजगेन्द्रारे सुपर्ण विनतात्मजनय मां तार्क्ष्य पूर्वेण यत्र धर्मस्य चक्षुषी
garutmanbhujagendrāre suparṇa vinatātmajanaya māṃ tārkṣya pūrveṇa yatra dharmasya cakṣuṣī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें