महाभारत 5.112.4
अजैकपादहिर्बुध्न्यै रक्ष्यते धनदेन चएवं न शक्यते लब्धुमलब्धव्यं द्विजर्षभ
ajaikapādahirbudhnyai rakṣyate dhanadena caevaṃ na śakyate labdhumalabdhavyaṃ dvijarṣabha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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