महाभारत 5.117.3
सुपर्णस्त्वब्रवीदेनं गालवं पततां वरःप्रयत्नस्ते न कर्तव्यो नैष संपत्स्यते तव
suparṇastvabravīdenaṃ gālavaṃ patatāṃ varaḥprayatnaste na kartavyo naiṣa saṃpatsyate tava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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