महाभारत 5.12.2
देवराज जहि क्रोधं त्वयि क्रुद्धे जगद्विभोत्रस्तं सासुरगन्धर्वं सकिंनरमहोरगम्
devarāja jahi krodhaṃ tvayi kruddhe jagadvibhotrastaṃ sāsuragandharvaṃ sakiṃnaramahoragam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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