महाभारत 5.121.6
प्राप्तः स्वर्गफलं चैव तमुवाच पितामहःनिर्वृतं शान्तमनसं वचोभिस्तर्पयन्निव
prāptaḥ svargaphalaṃ caiva tamuvāca pitāmahaḥnirvṛtaṃ śāntamanasaṃ vacobhistarpayanniva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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