महाभारत 5.122.10
विपरीता त्वियं वृत्तिरसकृल्लक्ष्यते त्वयिअधर्मश्चानुबन्धोऽत्र घोरः प्राणहरो महान्
viparītā tviyaṃ vṛttirasakṛllakṣyate tvayiadharmaścānubandho'tra ghoraḥ prāṇaharo mahān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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