महाभारत 5.123.20
यावनाथौ चरिष्येते त्वया नाथेन दुर्हृदाहतमित्रौ हतामात्यौ लूनपक्षाविव द्विजौ
yāvanāthau cariṣyete tvayā nāthena durhṛdāhatamitrau hatāmātyau lūnapakṣāviva dvijau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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