महाभारत 5.123.2
कृष्णेन वाक्यमुक्तोऽसि सुहृदां शममिच्छताअनुपश्यस्व तत्तात मा मन्युवशमन्वगाः
kṛṣṇena vākyamukto'si suhṛdāṃ śamamicchatāanupaśyasva tattāta mā manyuvaśamanvagāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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