महाभारत 5.123.5
इमां श्रियं प्रज्वलितां भारतीं सर्वराजसुजीवतो धृतराष्ट्रस्य दौरात्म्याद्भ्रंशयिष्यसि
imāṃ śriyaṃ prajvalitāṃ bhāratīṃ sarvarājasujīvato dhṛtarāṣṭrasya daurātmyādbhraṃśayiṣyasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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