महाभारत 5.128.1
वैशंपायन उवाच · vaiśaṃpāyana uvāca
तत्तु वाक्यमनादृत्य सोऽर्थवन्मातृभाषितम्पुनः प्रतस्थे संरम्भात्सकाशमकृतात्मनाम्
tattu vākyamanādṛtya so'rthavanmātṛbhāṣitampunaḥ pratasthe saṃrambhātsakāśamakṛtātmanām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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