महाभारत 5.128.39
दुर्ग्रहः पाणिना वायुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशीदुर्धरा पृथिवी मूर्ध्ना दुर्ग्रहः केशवो बलात्
durgrahaḥ pāṇinā vāyurduḥsparśaḥ pāṇinā śaśīdurdharā pṛthivī mūrdhnā durgrahaḥ keśavo balāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें