महाभारत 5.129.20
अचिन्तयन्नमेयात्मा सर्वं तद्राजमण्डलम्निश्चक्राम ततः शौरिः सधूम इव पावकः
acintayannameyātmā sarvaṃ tadrājamaṇḍalamniścakrāma tataḥ śauriḥ sadhūma iva pāvakaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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