महाभारत 5.131.7
उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा शेष्वैवं पराजितःअमित्रान्नन्दयन्सर्वान्निर्मानो बन्धुशोकदः
uttiṣṭha he kāpuruṣa mā śeṣvaivaṃ parājitaḥamitrānnandayansarvānnirmāno bandhuśokadaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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