महाभारत 5.133.2अहो क्षत्रसमाचारो यत्र मामपरं यथाईदृशं वचनं ब्रूयाद्भवती पुत्रमेकजम्aho kṣatrasamācāro yatra māmaparaṃ yathāīdṛśaṃ vacanaṃ brūyādbhavatī putramekajamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें