महाभारत 5.133.33
यदैव शत्रुर्जानीयात्सपत्नं त्यक्तजीवितम्तदैवास्मादुद्विजते सर्पाद्वेश्मगतादिव
yadaiva śatrurjānīyātsapatnaṃ tyaktajīvitamtadaivāsmādudvijate sarpādveśmagatādiva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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