महाभारत 5.136.2
श्रुतं ते पुरुषव्याघ्र कुन्त्याः कृष्णस्य संनिधौवाक्यमर्थवदव्यग्रमुक्तं धर्म्यमनुत्तमम्
śrutaṃ te puruṣavyāghra kuntyāḥ kṛṣṇasya saṃnidhauvākyamarthavadavyagramuktaṃ dharmyamanuttamam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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