महाभारत 5.14.2
इन्द्राणी संप्रहृष्टा सा संपूज्यैनामपृच्छतइच्छामि त्वामहं ज्ञातुं का त्वं ब्रूहि वरानने
indrāṇī saṃprahṛṣṭā sā saṃpūjyaināmapṛcchataicchāmi tvāmahaṃ jñātuṃ kā tvaṃ brūhi varānane
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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