महाभारत 5.140.2
अपि त्वां न तपेत्कर्ण राज्यलाभोपपादनामया दत्तां हि पृथिवीं न प्रशासितुमिच्छसि
api tvāṃ na tapetkarṇa rājyalābhopapādanāmayā dattāṃ hi pṛthivīṃ na praśāsitumicchasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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