महाभारत 5.141.43
कृष्ण उवाच · kṛṣṇa uvāca
उपस्थितविनाशेयं नूनमद्य वसुंधरातथा हि मे वचः कर्ण नोपैति हृदयं तव
upasthitavināśeyaṃ nūnamadya vasuṃdharātathā hi me vacaḥ karṇa nopaiti hṛdayaṃ tava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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